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हम गिद्ध कब से हो गए

हम पत्थर ही पूजेंगे


हम पत्थर ही पूजेंगे
उसे देवी बताएँगे 
मंदिरों सजाएंगे
साड़ी गहने चढ़ाएंगे 
और जो हांड मांस की 
साक्षात देवी 
मातृत्व का बहनत्व का 
वरदान देती 
जो जग की जननी 
उसे पूजना तो दूर 
दहेज़ लोभी बन जलाएंगे
पुरषत्व का ढोल पीटेंगे
हाथ उठाएंगे
व्यभिचारी दरिन्दे बन 
उसे नोचेंगे काट खाएंगे
हाँ पर हम उसे 
पत्थरों में जरुर पूजेंगे
उसे देवी बताएंगे






हम गिद्ध कब से हो गए 



अधरों पे मुस्कान हुई 
हम मुस्कानों को नोचेंगे 
दिल पाले अरमां जब भी 
हम अरमानो को रौंदेंगे 
पर उड़ना चाहे जो भी 
उड़ान नहीं होने देंगे 
गिद्ध दृष्टि आबरू पे 
हम गिद्ध कब से हो गए 



जिसका खेल हैं गुड्डा गुड्डीया 
उसको भी नर नोच रहा 
हवस का साया कच्चे मन पे 
न रत्ती भर सोच रहा 
इस पर भी इंसा मैं कहता 
मुझको जी संकोच रहा 
बचपन पंजो में 
हम गिद्ध कब से हो गए 



नयी चिड़िया थी 
उड़ने का अंदाज नया था 
अब की कोयल होना था 
उसका साज नया था 
काले बादलो ने घेरा 
बिजलियाँ बरसाई 
दुनिया देखती रही 
हम गिद्ध कब से हो गए 



तमाशा दुसरों का 
हम देखते हैं रहते 
कोई फब्तियां कसे 
हम देखते हैं रहते 
छेड़खानी करे 
हम देखते हैं रहते 
बेबसी की मूरत नहीं 
एक हिस्सा हम भी गिद्ध हैं 



तमाशा कब तुम्हारा हो जाए 
आग घर लग जाए 
दिन ढलने  में 
दुश्वार हो जाए 
कल की सोचो 
आवाज उठाओ रोको 
अपनी ख़ामोशी 
उसकी जुर्रत न बनो 
तमाशबीन हम गिद्ध से बदत्तर 
आवाज उठाओ रोको 
कल की सोचो 
गिद्ध न बनो 



देवी को खड्ग संभालना ही होगा 



जिसकी आबरू पे 
साडी मखमली चढ़े 
उसकी कराह दुनिया 
सुन भी ले 
चर्चा करे सब कैमरे
कैंडल जले 


जिसको निवाला एक नहीं 
उन पे भी
गिद्धों की दृष्टि नेक नहीं 
न वर्दी सुने 
न कुर्सी सुने 
न सुनता 
कभी हैं कैमरा  


मैं ये नहीं कहता 
जो दिल्ली मुंबई में हुआ 
वो अत्याचार नहीं 
बलात्कार नहीं 
मैं ये पूछता हूँ 
जो गांवों कस्बो घटा 
क्या उनसे हमारा 
कोई सरोकार नहीं 

मखमली साडी को भी 
जब न्याय मुश्किल हुआ 
अब खुद सोचिए
जो चिथड़ो ढकी 
उसका होता हैं क्या 


दरिंदा मामूली रहा 
तो कोई बात भी करो 
गर दरिंदा अमीरी में पला हो 
वर्दी बिकी कुर्सी बिकी 
न्याय सारा बिक गया 
कानून तो वैसे भी अँधा रहा 
वर्दी ने उसे वैश्या बता दिया 


इस पे भी कोई 
फुल्लन हो जाए 
तो हाय तोबा 
बंदूक उठाए 
तो हाय तोबा 


सूती और मखमली में 
भेद न करो 
आबरू सबकी हैं 
फरेब न करो 
आबादी में इंसानियत
कब की गई हैं गुम
गिनतियाँ सब गिनने लगो 
तो शर्म से मर जाओ तुम 


जब चीत्कारों से 
शहर गूंजे गूंजे बस्तियां 
गूंजे गाँव घर 
इस पर भी 
खुद को आदमी कहते मगर 


जब इन्साफ का तराजू 
कुछ तोलेगा नहीं 
समाज मेरा मूक 
कुछ बोलेगा नहीं 
फिर तो देवी को खड्ग
संभालना ही होगा 
महिषासुर मारना ही होगा 


: शशिप्रकाश सैनी 



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Saravanakumar Murugan
FROM THE AUTHOR'S DESK

Saravanakumar Murugan

Author & Storyteller · Someone is Special

Senior technology leader, writer, and photographer. What began in 2009 as a romantic journaling sanctuary on Few Miles has grown into published books (Shades of Life, Return), 55-word microfiction, and quiet stories that stay with people long after reading.

“முகமறியா நண்பர்களின் கருத்துக்களே எனக்குப் படிகற்கள்”
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© Few Miles by Saravanakumar Murugan · CC BY-NC-ND 4.0 International License

Comments

  1. Dear Shashi,

    It's my pleasure to have you as my guest writer. Thanks for gifting a poem on a sensitive topic :) I wish Government talk Rape as a serious issue and start acting towards it :)

    Someone is Special

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    Replies
    1. सरावना जी
      आप ने मेरी कविताओ को अपने ब्लॉग पे जगह दी
      इस के लिए मै आपका आभारी रहूँगा

      Delete
  2. शशि जी , हर बार आपकी कविता मुझे कुछ नया सीखती है I इतनी सहेजता और सुन्दरता के साथ आप बहुत सी बाते कह जाते हैं जिन्हें पढना बहुत रोचक होता है
    बेहद मार्मिक एवं संवेदनशील रचना I मानव का यह दानव रूप इतना खतरनाक और शरमसार हो सकता है इसकी कल्पना करके ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं I समाज की यह दुर्दशा करने वालों को सक्त से सक्त सज़ा मिलनी चाहिए I इसके लिए देश की महिलओं को मजबूत एवं जागरूक होने की आवाश्यता है I

    ReplyDelete
    Replies
    1. सिमरन जी
      आप सही फरमाती हैं
      किसी छेड़खानी को छोटा समझ नजर अंदाज न करे, विरोध दर्ज कराए

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